नारी वंदन : अंततः लोकतंत्र की अदालत में

फीचर लेख – डॉ श्यामलेंदु , सेंट्रल एडिटोरियल बोर्ड ,द जनपथ , दिल्ली

(यह लेखक का स्वतन्त्र विचार है)

जब भी यह समाचार सुनने में आता है कि मोदी जी आज रात साढ़े आठ बजे राष्ट्र को सम्बोधित करेंगे , सच मानिए  करोड़ों लोगों के कान खड़े हो जाते हैं , लाखों की धड़कने तेज़ हो जाती हैं। लेकिन भारत की आम जनता अपनी दैनिक सामान्य गति से चलती रहती है क्योंकि वो नोटबंदी देख चुकी है और उसे लगता है कि मोदी जी आएंगे तो कुछ न कुछ उसके हित की बात करेंगे। शनिवार यानी 18 अप्रैल 2026 की रात भी कुछ ऐसा ही हुआ होगा।

मोदी जी आये और भारत की माताओं, बहनों और बेटियों से जुड़े एक अत्यंत संवेदनशील मुद्दे पर राष्ट्र को संबोधित करते हुए उन्होंने महिलाओं की प्रगति में आई रुकावट पर गहरा दुख व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि सरकार के अथक प्रयासों के बावजूद नारी शक्ति वंदन अधिनियम संशोधन पारित नहीं हो सका, जिससे महिला आबादी के जायज़ सपनों को चकनाचूर कर दिया गया। श्री मोदी ने कहा, “इस दुर्भाग्यपूर्ण परिणाम के लिए मैं देश की सभी माताओं और बहनों से गहरी माफी मांगता हूं।”

इस बात पर जोर देते हुए कि राष्ट्रीय हित सर्वोपरि है, प्रधानमंत्री ने विशिष्ट राजनीतिक गुटों की इस बात के लिए कड़ी आलोचना की कि वे देश के कल्याण की बजाय पक्षपातपूर्ण लाभों को प्राथमिकता दे रहे हैं। देश भर में व्याप्त गहरी निराशा को देखते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि इस विधेयक की हार महिलाओं के आत्मसम्मान पर सीधा प्रहार है, एक ऐसा अपमान जिसे महिला मतदाता हमेशा अपने मन में संजोकर रखेंगी। श्री मोदी ने दृढ़ता से कहा, “महिलाएं सब कुछ भूल सकती हैं, लेकिन वे अपने स्वाभिमान पर हुए अपमान को कभी नहीं भूलतीं।”

प्रधानमंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि भारत की महिलाएं दुर्भावनापूर्ण इरादों से भलीभांति परिचित हैं और भविष्य में दोषी राजनेताओं को कड़ी सजा देंगी। नारी शक्ति वंदन अधिनियम संशोधन के परिवर्तनकारी दृष्टिकोण का विस्तार से वर्णन करते हुए प्रधानमंत्री ने बताया कि यह विधेयक आधी आबादी के लिए लंबे समय से लंबित अधिकारों को प्रदान करने और नए अवसर सृजित करने का एक व्यापक प्रयास है। उन्होंने कहा कि इस विधेयक का उद्देश्य व्यवस्थागत बाधाओं को दूर करना और सभी राज्यों की राजनीतिक शक्ति को, उनके आकार या भौगोलिक स्थिति की परवाह किए बिना, समान रूप से बढ़ाना है। श्री मोदी ने कहा, “यह संशोधन भारत के विकास की यात्रा में महिलाओं को समान सहयात्री बनाने का एक सच्चा प्रयास है।”

प्रधानमंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि भारत के नागरिकों ने राजनीति के इस घिनौने तरीके को पूरी तरह से पहचान लिया है और इसके पीछे के मकसद को भलीभांति समझ लिया है। श्री मोदी ने कहा, “देश अब महिलाओं के अधिकारों को छीनने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले घिनौने राजनीतिक तरीके को पूरी तरह से समझ चुका है।” प्रधानमंत्री ने स्पष्ट किया कि वंशवादी दल इस बात से भयभीत हैं कि उनके परिवार से बाहर की सशक्त महिलाएं उनके स्थानीय नेतृत्व के लिए खतरा बन सकती हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि पंचायतों में कार्यरत हजारों सक्षम महिलाएं वंशवादी राजनीतिज्ञों की गहरी जड़ें जमा चुकी असुरक्षा को सीधी चुनौती दे रही हैं।

ये तो एक पक्ष है क्योंकि लोकतंत्र में विपक्ष भी एक पक्ष होता है। उनका कहना है कि महिला आरक्षण का कानून तो बन चूका है फिर नारी वंदन का मुखौटा क्यों ? असल में मामला कुछ और है – केंद्र सरकार ने 14 अप्रैल (मंगलवार) को सांसदों को तीन ड्राफ़्ट बिल (मसौदा विधेयक) भेजे थे।  इनमें दो बड़े ऐतिहासिक बदलाव प्रस्तावित हैं –

पहला बदलाव है- लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर अधिकतम 850 करना. दूसरा बदलाव है- संसद के निचले सदन यानी लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करना। ये साल 2023 में पारित हुए नारी शक्ति वंदन अधिनियम पर आधारित हैं।  इसमें महिलाओं के लिए 33 फ़ीसदी आरक्षण का प्रावधान किया गया था।  लेकिन इसके लागू होने को भविष्य में होने वाली जनगणना और परिसीमन प्रक्रिया से जोड़ा गया था।

 यहाँ दिक्कत महिलाओं से नहीं है बल्कि जनसँख्या आधारित परिसीमन से है जैसे 2011 के मुकाबले उत्तर प्रदेश की जनसँख्या 20 प्रतिशत बढ़ी है तो यहाँ सीट भी ज्यादा होंगी वही 100 प्रतिशत साक्षर केरल में 4 प्रतिशत जनसंख्या बढ़ी है तो जाहिर है सीटें कम होंगी। विपक्ष का कहना भी है आप अभी 33 क्या 50 प्रतिशत महिला आरक्षण कर दो हम समर्थन करेंगे , लेकिन नारी वंदन के मुखौटे में आया ये बिल लोकतंत्र के लिए सही नहीं है।

वैसे भारत की राजनीति में महिलाओं की स्थिति पहले के मुकाबले अब बदल रही है. यह अब भागीदारी से नेतृत्व की ओर बढ़ रही है। आंकड़ों पर नजर डालें तो देश में आम चुनाव लड़ने वाली महिलाओं की कुल संख्या 1957 में 3% से बढ़कर 2024 में 10% हो गई है।  यही नहीं, चुनी गई महिला सदस्यों की संख्या, जो पहली लोकसभा में 22 और दूसरी लोकसभा में 27 थी, वो अब 18वीं लोकसभा में बढ़कर 75 हो गई है. यानी 543 में से 14% सांसद महिला हैं।

अब पूरी दुनिया पर नज़र डालें तो इंटर-पार्लियामेंट्री यूनियन और यूएन वीमेन के नए डेटा के अनुसार महिलाएं अभी भी समान राजनीतिक शक्ति से बहुत दूर हैं। दुनिया भर में कैबिनेट पदों में उनकी हिस्सेदारी सिर्फ 22.4% और संसदीय सीटों में 27.5% है. हालांकि, 14 देशों ने कैबिनेट में लैंगिक समानता हासिल कर ली है, जिससे यह साबित होता है कि समान प्रतिनिधित्व संभव है।  फिर भी, आठ देशों में अभी भी कोई महिला मंत्री नहीं है। फ़्रांस में 36 प्रतिशत महिला सांसद हैं तो सबसे ज्यादा न्यूजीलैंड में 46 प्रतिशत महिला सांसद है।

अब जब बिल पास नहीं हो सका तो प्रधानमंत्री मोदी जी लोकतंत्र की अदालत में जनता के पास आये हैं और अब जनता तय करेगी कि मातृशक्ति को कितनी हिस्सेदारी देनी है और कैसे देनी है फ़िलहाल लोकतंत्र का बल तो नज़र आता है और मोदी जी की आस्था भी।

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