आजकल का युवा वर्ग शादी के पारंपरिक बंधनों से इतर बिना सात फेरे लिए साथ रहने यानी लिव-इन रिलेशनशिप की ओर तेजी से कदम बढ़ा रहा है। शहरों से लेकर कस्बों तक लिव-इन का चलन बढ़ तो गया है, लेकिन इसके पीछे खड़े होने वाले कानूनी झमेले, विवाद और पैदा होने वाले बच्चों के भविष्य को लेकर अक्सर समाज में नई बहस छिड़ जाती है। अब छत्तीसगढ़ में तैयार हो रही समान नागरिक संहिता (यूसीसी) के जरिए लिव-इन रिश्तों को लेकर भी कानून का शिकंजा कसने और व्यवस्था को दुरुस्त करने की पुख्ता तैयारी शुरू हो गई है।
राजधानी रायपुर में समान नागरिक संहिता समिति के सामने स्वयंप्रभा फाउंडेशन और आम्रपाली सहकारी गृह निर्माण संस्था के प्रतिनिधियों ने अपने अहम सुझाव रखे। इस बैठक में सबसे ज्यादा चर्चा लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े संवेदनशील मसलों पर ही हुई।
लिव-इन का हो अनिवार्य रजिस्ट्रेशन, मनमर्जी पर लगे लगाम
बैठक के दौरान समिति के सदस्य रिटायर्ड आईएएस एम.के. राऊत और वरिष्ठ वकील मोहन पवार के सामने संगठनों ने दो-टूक बात रखी। प्रतिनिधियों ने साफ कहा कि लिव-इन संबंधों को अब केवल निजी फैसला मानकर अनदेखा नहीं किया जा सकता। ऐसे रिश्तों का कानूनी तौर पर अनिवार्य रजिस्ट्रेशन (पंजीयन) होना चाहिए। इससे दोनों पक्षों की जवाबदेही तय होगी और कल को कोई भी साथी जिम्मेदारियों से मुकर नहीं पाएगा। अक्सर देखा जाता है कि अनबन होने पर लिव-इन में रहने वाले साथी एक-दूसरे को मझधार में छोड़ देते हैं, जिससे विशेषकर महिलाओं को भारी सामाजिक और आर्थिक संकट से गुजरना पड़ता है। रजिस्ट्रेशन की व्यवस्था लागू होने से ऐसी मनमानी और शोषण पर पूरी तरह रोक लगेगी।
मासूम बच्चों का क्या कसूर? मिले संपत्ति और उत्तराधिकार का हक
इस चर्चा का सबसे भावुक और गंभीर पहलू था लिव-इन से पैदा होने वाले बच्चों का मुस्तकबिल। संगठनों ने जोरदार पैरवी करते हुए कहा कि ऐसे रिश्तों से जन्म लेने वाले बच्चों का क्या कसूर? उन्हें समाज में लावारिस या उपेक्षित नहीं छोड़ा जा सकता। यूसीसी के भीतर ऐसा कड़ा और स्पष्ट प्रावधान होना चाहिए, जिससे लिव-इन से जन्मे बच्चों को पिता और माता दोनों की पैतृक संपत्ति में पूरा कानूनी हक मिले। उनके पालन-पोषण, पढ़ाई-लिखाई और उत्तराधिकार की गारंटी कानून तय करे, ताकि किसी भी मासूम का भविष्य अधर में न लटके।
आदिवासी रीति-रिवाजों और महिला सुरक्षा का भी रखा गया ध्यान
स्वयंप्रभा फाउंडेशन के अध्यक्ष शिव नारायण मुंदड़ा, डॉ. मुकेश शाह और आम्रपाली संस्था के अध्यक्ष इन्द्रनाथ सिंह ने लिव-इन के साथ-साथ बेटियों के अधिकारों पर भी रोशनी डाली। उन्होंने कहा कि पैतृक संपत्ति में बेटियों को बराबर का हिस्सा मिलना चाहिए और बहुविवाह जैसी कुप्रथाओं पर पूरी तरह ताला लगना चाहिए। इसके साथ ही, प्रदेश की 32 प्रतिशत आदिवासी आबादी की अनूठी परंपराओं और संवैधानिक अधिकारों का पूरा सम्मान करने की बात भी उठाई गई। समिति ने इन तमाम सुझावों को बेहद संजीदगी से सुना और भरोसा दिलाया कि ड्राफ्ट तैयार करते समय इन व्यवहारिक बातों को प्रमुखता से शामिल किया जाएगा।









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