“पारो” नाट्य मंचन से प्रारंभ हुआ राष्ट्रीय 25वां रंग महोत्सव 2026 : साहित्य – कला की खुशबू से महका रायपुर

पटना, बिहार की “पारो” नाटक का हुआ पहला उद्घाटन मंचन- आगामी छह दिन में प्रत्येक दिन होगा नाट्य मंचन

कला से छत्तीसगढ़ का कल निखरेगा : गरिमा दिवाकर

रायपुर | नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (NSD) और छत्तीसगढ़ शासन के तत्वावधान में आयोजित 6 दिवसीय राष्ट्रीय 25वां रंग महोत्सव 2026 का शुभारंभ पहली बार रायपुर के पंडित दीनदयाल उपाध्याय ऑडिटोरियम में भव्य और गरिमामय ढंग से हुआ।

उद्घाटन सत्र दीप प्रज्ज्वलन के साथ संपन्न हुआ, जिसने रंगमंच, साहित्य और लोक-संवेदना के साझा उत्सव का संकेत दिया। उद्घाटन अवसर पर NSD के पूर्व निदेशक देवेंद्र राज अंकुर, वरिष्ठ रंगकर्मी राजकमल नायक, विशिष्ट अतिथि शशांक शर्मा (अध्यक्ष, छत्तीसगढ़ साहित्य अकादमी) सहित अनेक साहित्य और रंगमंच से जुड़े विशिष्टजन उपस्थित रहे।

सम्मानित होते शशांक शर्मा, अध्यक्ष छत्तीसगढ़ साहित्य अकादमी

अपने संबोधन में विशिष्ट अतिथि और छत्तीसगढ़ साहित्य अकादमी के अध्यक्ष शशांक शर्मा ने छत्तीसगढ़ को प्राकृतिक रूप से समृद्ध और बौद्धिक रूप से सशक्त भूमि बताते हुए कहा कि इस प्रदेश ने साहित्य और रंगकर्म को नई दिशा दी है। सत्यदेव दुबे और हबीब तनवीर जैसे महान रंगकर्मियों को स्मरण करते हुए उनके योगदान को अविस्मरणीय बताया गया। मशहूर रंगकर्मी राजकमल नायक ने कहा कि रंगमंच कलाकारों के लिए भावों और अभिव्यक्तियों को जीवंत रूप देने का सबसे सशक्त माध्यम है और ऐसे महोत्सव कलाकारों को नई ऊर्जा प्रदान करते हैं। वहीं NSD के पूर्व निदेशक देवेंद्र राज अंकुर ने रायपुर से अपने पुराने जुड़ाव को याद करते हुए कहा कि यह उनके लिए विशेष प्रसन्नता का क्षण है कि NSD की शिष्या गरिमा दिवाकर के माध्यम से ऐसा आयोजन संभव हो पाया। उन्होंने यह भी जानकारी दी कि NSD की प्रतिष्ठित पत्रिका “रंग प्रसंग” में छत्तीसगढ़ पर विशेष अंक प्रकाशित होने जा रहा है, जो प्रदेश के रंगकर्म के लिए गर्व का विषय है। उद्घाटन सत्र का आभार खैरागढ़ विवि के प्रोफेसर डॉ. योगेंद्र चौबे ने व्यक्त किया।

पटना की रंगमंचीय मिट्टी से उपजा “पारो” ने रायपुर के हृदय को छू लिया

महोत्सव की उद्घाटन प्रस्तुति के रूप में पटना (बिहार) से आई नाट्य प्रस्तुति “पारो” ने दर्शकों को भीतर तक झकझोर दिया। बाबा नागार्जुन के उपन्यास से प्रेरित और शारदा सिंह के निर्देशन में मंचित यह नाटक बिहार की उस उपजाऊ रंगमंचीय भूमि का सशक्त उदाहरण बना, जहां सामाजिक यथार्थ और मानवीय पीड़ा को गहराई से अभिव्यक्त करने की परंपरा रही है। “पारो” नाटक ने आज़ादी से पहले की कुप्रथाओं को केंद्र में रखते हुए रूप-रंग भेद, लिंग भेद और बाल विवाह जैसी सामाजिक विकृतियों को अत्यंत मार्मिकता से प्रस्तुत किया। पारो के चरित्र के माध्यम से एक किशोर बालिका के मनोभाव, उसकी विवशताएं और सपनों का टूटना दर्शकों के मन में गहरी छाप छोड़ गया। नाटक के समापन पर दर्शक दीर्घा में लगभग पाँच मिनट तक खड़े होकर तालियों की गूंज सुनाई देती रही। इस स्नेह और सम्मान से अभिभूत होकर नाटक की निर्देशिका शारदा सिंह भावुक हो गईं।

भाषा, भाव और संस्कृति की समान धड़कन

इस प्रस्तुति ने यह भी रेखांकित किया कि छत्तीसगढ़ और बिहार की भाषा, लोक-संस्कृति और संवेदनाएं एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई हैं। लोकबोली, स्त्री पीड़ा, सामाजिक संघर्ष और मानवीय करुणा—ये सभी तत्व दोनों राज्यों की सांस्कृतिक आत्मा में समान रूप से स्पंदित होते हैं। “पारो” इसी साझा सांस्कृतिक चेतना का जीवंत प्रतीक बनकर रायपुर के मंच पर उतरा। 25वां रंग महोत्सव न केवल एक नाट्य आयोजन रहा, बल्कि यह दो सांस्कृतिक धरातलों के बीच संवाद, संवेदना और समानता का सेतु बनकर सामने आया।

उक्त जानकारी देते हुए कार्यक्रम संचालिका मशहूर गायिका गरिमा दिवाकर ने बताया आगामी छह दिन विभिन्न विषयों पर देशभर के कोने कोने से कलाकार अपनी प्रस्तुति देंगें। इस प्रकार छत्तीसगढ़ में कला से छत्तीसगढ़ का कल निखरेगा ।

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