पोषण पहल सखी से दूर होगा कुपोषण, आईआईटी भिलाई और सीएसआर सहयोग से शुरू होगा पोल्ट्री उद्यम, पचास आंगनबाड़ी बच्चों को सप्ताह में दो दिन मिलेंगे निःशुल्क अंडे, पोषण पहल सखी से दूर होगा कुपोषण

महिला सशक्तिकरण, ग्रामीण आजीविका विस्तार और बाल पोषण संवर्धन को एकीकृत रूप से साधने के उद्देश्य से मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी जिले में एक विशिष्ट परियोजना की शुरुआत की गई है। ग्राम भर्रीटोला में ‘पोषण पहल सखी’ परियोजना के सुचारू संचालन के लिए जिला प्रशासन और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) भिलाई के बीच एक औपचारिक एमओयू निष्पादित किया गया है।

इस परियोजना की रूपरेखा इस प्रकार तैयार की गई है कि इसके जरिए ग्रामीण अंचल की महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के साथ-साथ आंगनबाड़ी केंद्रों में दर्ज बच्चों के पोषण स्तर में ठोस सुधार लाया जा सके। परियोजना के तहत ग्राम भर्रीटोला स्थित गौठान परिसर में महिला समूहों द्वारा संचालित लेयर पोल्ट्री उद्यम की स्थापना की जाएगी। इसका मैदानी संचालन तिरंगा संकुल स्तरीय संगठन के प्रत्यक्ष सहयोग से किया जाएगा।

योजना के प्राथमिक चरण में तीन स्थानीय महिलाओं को नियमित और स्थायी रोजगार से जोड़कर आर्थिक सुरक्षा प्रदान की जाएगी। इसके समानांतर, गांव के आंगनबाड़ी केंद्रों के 50 बच्चों को सप्ताह में दो बार निःशुल्क ताजा अंडा वितरित किया जाएगा। बच्चों के नियमित भोजन में इस प्रोटीनयुक्त विकल्प के जुड़ने से क्षेत्र में कुपोषण की दर घटाने में मदद मिलेगी। इस तरह यह पहल एक ही समय में आर्थिक आत्मनिर्भरता और बेहतर जनस्वास्थ्य दोनों लक्ष्यों को पूरा करेगी।

‘पोषण पहल सखी’ एक सशक्त त्रिपक्षीय मॉडल पर आधारित है। जिला प्रशासन इसके लिए शेड, भूमि और जरूरी बुनियादी ढांचा उपलब्ध करा रहा है। वहीं, आईआईटी भिलाई तकनीकी व वैज्ञानिक मार्गदर्शन के साथ क्रियान्वयन एजेंसी की जिम्मेदारी संभाल रहा है। परियोजना के लिए आवश्यक वित्तीय संसाधन एबीस फूड्स एंड प्रोटीन्स प्राइवेट लिमिटेड द्वारा कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) मद से मुहैया कराए जा रहे हैं।

संस्थान द्वारा महिला स्व-सहायता समूहों को आधुनिक कुक्कुट पालन, जैव-सुरक्षा मानकों, वित्तीय लेखा-जोखा प्रबंधन, दैनिक उद्यम संचालन और उत्पाद विपणन का गहन प्रशिक्षण भी दिया जाएगा। इसका मुख्य ध्येय महिलाओं को सिर्फ दैनिक कार्य तक सीमित न रखकर कुशल उद्यमी और प्रबंधक के रूप में तैयार करना है।

इस समूची परियोजना को आगामी तीन वर्षों की समय-सीमा में पूरी तरह स्वावलंबी और वित्तीय रूप से सक्षम बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इसके बाद प्रशिक्षित स्थानीय महिला समूहों को उद्यम का पूर्ण स्वामित्व सौंप दिया जाएगा, जिससे सुदूर वनांचल में आजीविका और पोषण की यह व्यवस्था दीर्घकाल तक निरंतर बनी रहे।

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